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dubeyraghvendra


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फिर मत कहियेगा कि वे खलिहर (विदाउट बिजनेस) हैं

Posted On: 28 Jan, 2010  
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Hello world!

Posted On: 25 Jan, 2010  
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यह आवाज लोहिया के नाम की मचान से थी

Posted On: 25 Jan, 2010  
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आदरणीय दूबे जी, बाजारवाद का मूल चेहरा सामने लाने का प्रयास बधाई योग्य है. मुझे यह सोच कर चिंता होती है कि हमारी नई पीढ़ी क्या सीख रही है. क्या सिर्फ पिज्जा -बर्गर खाते हुए बड़े-बड़े माल्स में किसी गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड के हाथ में हाथ दाल कर टहलना और अपना अधिकाँश समय उल्टी -सीधी बातों में जाया करना, या कोई रचनात्मकता भी सृजित होने की संभावना बनेगी इस तथाकथित आधुनिक होती जा रही जनरेशन में. एक प्रकार का अपसंस्कृतिकरण हो रहा है. यदि पूरे परिदृश्य का सूक्ष्म अवलोकन किया जाए तो तस्वीर बड़ी भयानक नज़र आएगी. एक पूरी की पूरी पीढ़ी का अजीबोगरीब ढंग से रूपांतरण हो रहा है. राष्ट्रवाद और मानववाद का क्षरण दिखाई देने लगा है. हाँ यह बात अलग है कि इस पीढ़ी में अपनी परम्पराओं और संस्कृति को पिछड़ा समझने की भावना जरूर पनप चुकी है. यानी समग्र रूप से मानसिक और सांस्कृतिक दासता. मैं चाहूँगा कि आप इस विषय को आगे जरूर बढाएं.

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